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भाग्य का खेल

 

 


 कहते हैं हमारे भाग्य में जो लिखा होता है वह हमेशा हमें मिलकर रहता है और जो कुछ हमारे भाग्य में नहीं लिखा होता वह कभी भी हमें नहीं मिलता | भाग्य का खेल बहुत ही अनोखा होता है. इस भाग्य के खेल को समझना बहुत ही मुश्किल है |

कई बार हमारे जीवन में ऐसा होता है. कि हम बिल्कुल मंजिल के नजदीक होते हैं और रास्ता भूल जाते हैं |फिर हमें पता चलता है कि मंजिल के पास से हम गुजर गए | यह सारा भाग्य का ही खेल है. इंसान अपने आप को बहुत ही समझदार समझता है. लेकिन जब भाग्य अपना खेल खेलता है. तो सारी समझ बूझ खत्म हो जाती हैं |

हमारे जीवन में भी कई बार ऐसे हालात पैदा हुए होंगे |हमें भी कई बार बहुत अफसोस हुआ होगा के सफलता की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते गिर गए | कई बार इंसान बहुत मेहनत करता है. और सोचता है कि मैं अपनी मेहनत से कुछ ना कुछ हासिल जरूर कर लूंगा. लेकिन हासिल वही होगा जो भाग्य में लिखा होगा |यही भाग्य का खेल है |

मैं आपको एक छोटी सी कहानी के जरिए बताती हूं |

एक बड़ा गरीब दुकानदार था | उसका गुजारा नहीं होता था | इत्तेफाक से एक दिन एक महात्मा उसके पास आए | उस दुकानदार ने बड़े प्रेम से उनकी सेवा की | जब महात्मा प्रसन्न हुए तो उसने आंखों में आंसू भरते हुए प्रार्थना की," मैं गरीब हूं | मेरा गुजारा नहीं होता, आप मुझ पर कृपा करो |" महात्मा मेहरबान हो गए और कहने लगे कि मेरे पास पारस है, मैं तुम्हें 3 महीने के लिए देता हूं | इतने समय में जितना चाहे सोना बना लेना | महात्मा तो कृपा करके चले गए, लेकिन जीव का भाग्य उसके साथ रहता है | वह गरीब दुकानदार बाजार गया | पूछा कि लोहे का क्या भाव है ? लोहे वाले ने कहा कि तो 5 रुपए मन था अब 7 रुपए मन है | कहने लगा, मुझे यह घाटे का सौदा नहीं करना |" मूर्ख को इतना पता नहीं था कि एक मन सोने का कितना रुपया होता है | बोला, जब 5 रुपए मन होगा तब खरीद लूंगा |" घर लौट आया | दूसरे महीने फिर बाजार गया और पूछा," लोहे का क्या भाव है ?" दुकानदार ने कहा, लाला जी, अब तो और भी बढ़ गया है |" फिर बोला, जब 5 रुपए मन होगा तब खरीद लूंगा |" तीसरे महीने फिर बाजार गया लोहे का भाव पहले से बढ़कर 15 रुपए हो चुका था | खाली हाथ वापस आ गया |

इतने में 3 महीने गुजर गए | उधर महात्मा ने सोचा कि चलो जाकर अपना पारस ले आए हैं, उस दुकानदार ने तो बड़े-बड़े आलीशान मकान बनवा लिए होंगे | लेकिन जब आए तो देखकर हैरान रह गए | वहीं टूटी हुई दुकान, वही पुराना सा मकान | महात्मा अपना पारस लेकर चले गए |

यही मिसाल हम सब पर घटती है | मनुष्य जन्म पारस है | महात्मा कुल मालिक है, जिसने हम पर कृपा करके हमें पारस जैसा मनुष्य जन्म दिया है | हमारे अंदर कुल मालिक अकाल पुरुष है | हम संसार के बाकी सब कामों की ओर तो ध्यान देते हैं लेकिन परमात्मा से मिलाप के काम को टॉलते रहते हैं | हम यह नहीं समझते कि परमात्मा से मिलाप करके हम उसका ही रूप हो जाएंगे और जन्म मरण के बंधनों से हमेशा के लिए आजाद हो जाएंगे | अगर हम मनुष्य जन्म पाकर अंतर में तरक्की करके परमात्मा से मिलाप ना करें तो हमसे ज्यादा खोटे भाग्य वाला और कौन हो सकता है |

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धन्यवाद

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